कृष्ण सम्मोहन बाण साधना

Sammohan Baan Mantra Sadhana

महा भारत में जब पांडव अज्ञात वास बनवास काट रहे थे तो एक बार वृह्नाल्ला बने अर्जुन को अपने गुरु जनों और कौरव सेना का सामना करना पड़ा .
अर्जुन नहीं चाहते थे कि उन्हें कोई पहचाने इसलिए गुरुजनों का सामना नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने सम्मोहन बाण का इस्तेमाल कर सभी को सुला दिया और अपने भेद को भी छुपा लिया .

कालान्तर में ऐसी विद्याएँ लुप्त होती गई जो गुरुकुल में शाश्त्रों की शिक्षा देते वक़्त प्रदान की जाती थी .
जिनमें अस्त्र शस्त्र आदि विद्या भी दी जाती थी. सद्गुरु जी ने सभी विद्याओं को पुनर्जीवित कर इस धरा पर स्थापित किया .
उन्होंने इन विद्याओं का ही नहीं बल्कि पुरे जीवन का मर्म समझाया जिसे प्राप्त करना हर साधक का लक्ष्य बन गया .
कुछ ऐसे दुर्लभ प्रयोग व साधनाएं होती हैं जिन्हें सहज प्राप्त करना संभव नहीं होता , जहाँ बात सम्मोहन की हो तो श्री कृष्ण जी का चित्रण अपने आप हो जाता है और सिर श्रद्धा से अपने आप झुक जाता है और जीवन में प्रेम की लहर दौड़ जाती है, शरीर में रोमांच पैदा होने लगता है, हवा से संगीत तरंगें प्रवाहित होने लगती है, सारा वातावरण एक महक से भर उठता है, बादलों की गड़गड़ाहट से मेघ संगीत लहरी बजने लगती है यह सभी सम्मोहन तो है जो प्रकृति हमेशा करती है और आप सम्मोहित होते चले जाते हैं | दृश्य आप को अपनी ओर आकर्षित करते हैं | प्रकृति का यही गुण अपनाकर साधक श्रेष्ट बन जाता है और प्रकृति से एकाकार हो जाता है तो जीवन में सुगंध व्याप्त होती ही है .
जब तक प्रकृति तत्व आप में नहीं आता कैसे एक अप्सरा और यक्षिणी को बुला पाओगे, संभव ही नहीं है .
कैसे किन्नरी को अपने बस में कर पाओगे, इस तत्व के बिना नहीं हो सकता क्योंकि एक प्रकृति ही है जो सबको अपनी ओर आकर्षित करती है .
जहाँ सन्यासी प्रकृति को पूरी तरह अपना लेते हैं तभी तो श्रेष्ठ बन पाते हैं और प्रकृति उन्हें स्वयं पालने लगती है .
अगर साधक बन कर इस तथ्य को अपनाओगे तो सहज ही समझ जाओगे कि प्रकृति क्या चाहती है आपसे .
आप त्राटक करते हो या कोई साधना उसमें प्रकृति को ही निहारते हो .
उसी प्रकृति में व्याप्त सुगंध आपकी आँखों के रास्ते आपमें भी व्याप्त हो जाती है | प्रकृति को निहारना ही अभ्यास है और अपना लेना सम्मोहन और प्रेम का संगीत या प्रकृति संगीत सुनना क्रिया है, उसे समझ लेना सम्मोहन है अब सवाल यह है कि ऐसा क्या करें कि प्रकृति का संगीत समझ आ जाये और सम्मोहन की क्रिया अपने आप संपन्न हो जाये जैसे प्रकृति में स्वयं ही होती है | उच्च कोटि के फकीरों और संतो में एक कहावत कही जाती है “कुदरत नार फकीरी की ” अर्थात कुदरत या प्रकृति को अपना लेना ही जीवन की पूर्णता है और यही श्री कृष्ण जी का दिव्य सन्देश है क्योंकि वो बार-बार कहते हैं कि अर्जुन तुम मुझे पहचानो, मैं नदियों में गंगा नदी हूँ, दरखतों में पीपल हूँ आदि आदि | ऐसे बहुत उदाहरण देकर अर्जुन को समझाया | क्योंकि श्री कृष्ण पूर्ण सम्मोहन का रूप हैं और प्रकृति को अपना चुके थे तभी जर्रे जर्रे में व्याप्त हैं,यहाँ एक सम्मोहन बाण साधना दे रहा हूँ जो गोपनीय तो है ही और अपने आपमें पूर्ण सम्मोहन लिए हुए है ,परखी हुई साधना है .

साधना विधि 1. इसे अष्टमी या श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन और बंसंत पंचमी से या शुभ मुहूर्त में शुरू किया जा सकता है
यह 21 दिन की साधना है .
2. इसमें मंत्र सिद्ध यंत्र व माला ले कर ही जाप से करें |
3. मन्त्र जाप 51 माला करना है |
4. जप के वक़्त शुद्ध घी की ज्योत लगा दें |
5. गुरु पूजन, गणेश पूजन और श्री कृष्ण पूजन अनिवार्य है |
6. भोग के लिए दूध का बना प्रशाद मिश्री में छोटी इलायची मिलाकर पास रख लें |
7. हो सके तो षोडश प्रकार से पूजन करें नहीं तो मिलत उपचार जैसा आपको आता है कर लें |
8. वस्त्र पीले और आसन पीला हो |
9. दिशा उत्तर रहेगी |
10. साधना के अंत में पलाश की लकड़ी ड़ाल कर उसमें घी से दस्मांश हवन करना है |
अगर हवन नहीं कर सकते तो हवन हम आप के लिये कर दें गे.

ऐसा करने से साधना सिद्ध हो जाती है और आपकी आँखों में सम्मोहन छा जाता है | इसका प्रयोग भलाई के कार्यो में लगाएं, यह अमोघ शक्ति है |

मन्त्र -:
ॐ कलीम कृष्णाय सम्मोहन बाण साध्य हुं फट

||Om kleem krishnaye smmohan baan sadhya hum phat ||

हवन करते वक़्त मन्त्र के अंत में स्वाहा लगा लें |

सम्मोहन मंत्र साधना

सम्मोहन साधना से आप किसी को भी अपने वश में कर सकते है


सम्मोहन मतलब मोहित करना.
1. आपका मस्तिष्क शांत और शून्य होना चाहिए
2. आप लंबे समय तक एक पाइंट, विचार पर एकाग्र हो सके
3. आप खुद को सकारात्मक बनाये रख सके।
तीसरा बिंदु सबसे महत्वपूर्ण है क्यों की अक्सर ऐसा होता है की शुरू के अभ्यास में ही हम कुछ देर के अभ्यास से थकान हो सकती है ।
श्री कृष्ण : सम्मोहन साधना में सबसे अधिक पारंगत अगर कोई है तो वो है श्री कृष्ण। माना जाता है की 65 कलाओ में वे महारत हासिल कर चुके थे और मोहिनी, माया जाल की विद्या उनमे ही एक थी। श्री कृष्ण सिर्फ बांसुरी की धुन मात्र से सबको मोहित कर लेते थे, यहाँ तक की प्रकृति को भी।
मंत्र साधना के लिये सम्मोहन यंत्र व माला जरूर ले लें, यंत्र को गंगा जल से स्नान करवा कर किसी साफ प्लेट में स्थापित करें ,धूप दीप जला कर संक्षिप्त पूजा करें.
मंत्र का प्रयोग : सम्मोहन साधना का ये प्रयोग 2 दिन का है। सर्व देव पूजन के बाद  श्री कृष्ण पूजन करें बाद अपने सामने सुपारी रखे। घी का दीपक प्रज्जवलीत करे और नैवेध के रूप में सफ़ेद लड्डू का भोग दे। इसके पश्चात् पंचोपचार करे। अब सफ़ेद स्फटिक, हकीक की माला का 2 दिन तक रोज 11 माला का जाप करे। अगर माला न मिले तो अंगुली पर भी कर सकते है। कम से आधा घंटे या एक घंटे माला जप में लगता है।
मंत्र निम्न है :
ॐ क्लीं क्लीं क्रीं क्रीं हुं हुं फट्

आसन सफ़ेद रंग का और जाप दिशा पूर्व हो इसका ध्यान रखे। इस दौरान आप अपान मुद्रा का प्रदर्शन हाथ से लगातार करते रहे तो अनुभव अच्छा रहता है। पढ़े : त्राटक में सफलता के लिए जरुरी है प्राण का प्रचुर मात्रा में होना
sammohan sadhna mantra

में खास क्या है ? इस मंत्र से आपके अंतर के विकार भी नष्ट होने लगते है। जब भी आपका मन निर्मल होगा आप आपने आराध्य को पाएंगे आपके आराध्य आपके मन में तब विचरण करते है जब आप सब लोभ, विकार से रहित हो जाते है। हमें चाहिए की हम अपने मन के विकार को दूर करते रहे ताकि अपने अंतर को निर्मल रख सके। कुछ शक्तिया कम समय में भी अपना असर दिखाने लगती है हमें इससे बचना चाहिए. अगर आप साधना में नए नए है तो सरल शाबर मंत्र साधना के कुछ मंत्र घर बैठे सिद्ध कर सकते है. सम्मोहन साधना में ध्यान रखे : हम जब भी किसी मंत्र का जाप करते है उसके उच्चारण की 3 अवस्थाये होती है। पहला जोर जोर से उच्चारण : इसमें हम खुद को बार बार एक ही मंत्र पर फोकस करते है ये उनके लिए प्रभावी है जिनका मन चंचल होता है और एक जगह टिकता नहीं है। दूसरा बुदबुदाना : इस अवस्था में आपको लगता है की आप कुछ उच्चारण कर रहे है पर क्या ये स्पस्ट नहीं रहता है दुसरो के लिए। इस अवस्था में हम खुद को एकाग्र रखते है। तीसरी अंतर में उच्चारण : ये अवस्था आपको लंबे ध्यान के बाद मिलती है। इस अवस्था में आप बाहरी तौर पर चाहे बैठे हो सो रहे हो या ध्यान कर रहे है मंत्र आपके अंतर में गुंजायमान रहता है। ये अवस्था आपके बाह्य वातावरण और अंतर के माहौल में प्रभाव के फर्क को दिखाती है। आप के अंतर में क्या चल रहा है आपके ऊपरी तौर पर स्पस्ट नहीं होता है और आप दुसरो के लिए रहस्यमयी हो जाते है। एक सम्मोहनकर्ता इस अवस्था में सबसे ज्यादा लाभ उठाता है। सम्मोहन साधना किस तरह काम करती है : आप सामान्य साधना में जिस तरह मन को साधते है फिर चाहे वो त्राटक हो या ध्यान इस साधना में भी आप संयम द्वारा मन की साधना करते है। जो इसे प्रभावशाली बनाती है। अगर आप खुद का संयम करने में सक्षम है तो आपमें ज्यादार शक्तिया वैसे ही जाग्रत होने लगती है। sammohan sadhna mantra

आपके मायाजाल पर काम करती है। सम्मोहन में किसी को जो भावना दी जाती है वो उसके खुद के विचारो को रोक देती है और आपके विचार उसे कल्पना बनाने में मदद करते है जो उसे हकीकत लगने लगती है। यानि आपका सामने वाले को आपकी मर्जी से सोचने देना, जो आप उसे दिखाना चाहते है वही दिखाना पढ़े

मूर्छा लाई जा सकती है। और ऐसे करतब करवाये जा सकते है जो सामान्य समझ के लिए सिर्फ चमत्कार है। यही साधनाओ की असली शक्ति है। अगर आप साधना करते है तो एक तरह से आप उसका संयम करते है, धारणा शक्ति को मजबूत करते है। किताबो में दी गई sammohan sadhna mantra भी प्रभावी होती है। फर्क सिर्फ इतना है की जी अनुपात में आपको साधना बताई जाती है उसके आसपास की साधना रह जाने पर प्रभाव भी आपको उसके अनुपात के मिलते है बिलकुल वैसे ही जैसे दवा की मात्रा देना।

सावधानिया :
किसी भी साधना की शुरुआत करने से पहले निम्न बातो पर ध्यान देना चाहिए जिससे आपको साधना के दौरान या बाद में गलत अनुभव, भय या नुकसान का सामना ना करना पड़े। आप जो साधना करना चाहते है उसे अनुभवी लोगो से पूछे और अपने मन की सभी शंकाओ का समाधान कर ले ताकि साधना में अड़चन ना आए। साधना के दौरान अपने आराध्य और गुरु का पूजन जरूर करना चाहिए। साधना के दौरान मन में साधना के प्रति प्रबल भावना होनी चाहिए। आपके विचार और भाव भी साधना के अनुसार होने चाहिये। जैसे सात्विक, तामसिक और जिस देवी देव की साधना कर रहे है उसका प्रभाव और आचरण कैसा है। किसी भी साधना का प्रयोग दिखावे के लिए नहीं करना चाहिए। दोस्तों आज ऐसे कई लोग है जो इन साधनाओ का खासतौर से सम्मोहन साधना का गलत फायदा उठाते है। जैसे वशीकरण अतः साधना के गलत प्रयोग की गलती कभी न करे। ये आपके आचरण और व्यव्हार के साथ मनोबल को नष्ट कर देती है। और आपकी आध्यात्मिक गति रुक सकती है।

श्री कृष्ण चालीसा

पावन और पवित्र संपूर्ण श्री कृष्ण चालीसा बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम। अरुणअधरजनु बिम्बफल, नयनकमलअभिराम॥

पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज। जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

जय यदुनंदन जय जगवंदन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥ जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥ जय नट-नागर, नाग नथइया॥

कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥ पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥

वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥ आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥ राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥ कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥

नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥ मस्तक तिलक, अलक घुंघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥

करि पय पान, पूतनहि तार्‌यो। अका बका कागासुर मार्‌यो॥ मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥

सुरपति जब ब्रज चढ़्‌यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥ लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥

लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥ दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥ कोटि कमल जब फूल मंगायो॥ नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥ करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥ केतिक महा असुर संहार्‌यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्‌यो॥ मात-पिता की बन्दि छुड़ाई। उग्रसेन कहं राज दिलाई॥ महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥

भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥ दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहं मारा॥ असुर बकासुर आदिक मार्‌यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्‌यो॥ दीन सुदामा के दुख टार्‌यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्‌यो॥ प्रेम के साग विदुर घर मांगे। दुर्योधन के मेवा त्यागे॥ लखी प्रेम की महिमा भारी। ऐसे श्याम दीन हितकारी॥

भारत के पारथ रथ हांके। लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥ निज गीता के ज्ञान सुनाए। भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥ मीरा थी ऐसी मतवाली। विष पी गई बजाकर ताली॥ राना भेजा सांप पिटारी। शालीग्राम बने बनवारी॥

निज माया तुम विधिहिं दिखायो। उर ते संशय सकल मिटायो॥ तब शत निन्दा करि तत्काला। जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥ जबहिं द्रौपदी टेर लगाई। दीनानाथ लाज अब जाई॥ तुरतहि वसन बने नंदलाला। बढ़े चीर भै अरि मुंह काला॥ अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥ ‘सुन्दरदास’ आस उर धारी। दया दृष्टि कीजै बनवारी॥ नाथ सकल मम कुमति निवारो। क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥ खोलो पट अब दर्शन दीजै। बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥ दोहा यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि। अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

कृष्ण मंत्र साधना

कृष्णा मंत्र साधना

सर्वप्रथम मंत्र सिद्ध यंत्र व माला लेकर साधना प्रारंभ करें.

शुभ मुहूर्त में नहा धो कर यंत्र को साफ प्लेट में स्थापित करें.

यंत्र की पूजा कर के मंत्र जाप आरम्भ करें

कृष्ण मंत्र तंत्र साधनाइस मंत्र के द्वारा भगवान श्री कृष्ण का यंत्र पर आवाहन करना चाहिए

-ॐ सहस्त्र शीर्षाः पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्र-पातस-भूमिग्वं सव्वेत-सत्पुत्वायतिष्ठ दर्शागुलाम् |
आगच्छ श्री कृष्ण देवः स्थाने-चात्र सिथरो भव ||

भगवान श्री कृष्ण की पूजा के दौरान इस मंत्र को पढ़ते हुए उन्हें नारियल फल समर्पण करना चाहिए-

इदं फ़लं मया देव स्थापित पुर-तस्तव |
तेन मे सफ़लानत्ति भरवेजन्मनि जन्मनि ||

इस मंत्र को पढ़ते हुए भगवान श्री कृष्ण यंत्र को पान-बीड़ा समर्पण करना चाहिए-

ॐ पूंगीफ़लं महादिव्यं नागवल्ली दलैर्युतम् |
एला-चूर्णादि संयुक्तं ताम्बुलं प्रतिगृहयन्ताम् ||

इस मंत्र को पढ़ते हुए बाल गोपाल भगवान श्री कृष्ण को चन्दन अर्पण करना चाहिए-

ॐ श्रीखण्ड-चन्दनं दिव्यं गंधाढ़्यं सुमनोहरम् |
विलेपन श्री कृष्ण चन्दनं प्रतिगृहयन्ताम् ||

श्री कृष्ण की पूजा करते समय इस मंत्र को पढ़ते हुए उन्हें सुगन्धित धूप अर्पण करना चाहिए-

वनस्पति रसोद भूतो गन्धाढ़्यो गन्ध उत्तमः |
आघ्रेयः सर्व देवानां धूपोढ़्यं प्रतिगृहयन्ताम् ||

इस मंत्र के द्वारा नंदलाल भगवान श्री कृष्ण यंत्र को यज्ञोपवीत समर्पण करना चाहिए-

नव-भिस्तन्तु-भिर्यक्तं त्रिगुणं देवता मयम् |
उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वरः ||

भगवान देवकी नंदन की पूजा के दौरान इस मंत्र को पढ़ते हुए श्री कृष्ण जी को वस्त्र समर्पण करना चाहिए-

शति-वातोष्ण-सन्त्राणं लज्जाया रक्षणं परम् |
देहा-लंकारणं वस्त्रमतः शान्ति प्रयच्छ में ||

श्री कृष्ण पूजा के दौरान इस मंत्र को पढ़ते हुए बाल गोपाल यंत्र को शहद स्नान करना चाहिए-

पुष्प रेणु समुद-भूतं सुस्वाद मधुरं मधु ||
तेज-पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृहयन्ताम् ||

भगवान श्री कृष्ण की पूजा करते समय इस मंत्र के द्वारा उन्हें अर्घ्य समर्पण करना चाहिए-

ॐ पालनकर्ता नमस्ते-स्तु गृहाण करूणाकरः ||
अर्घ्य च फ़लं संयुक्तं गन्धमाल्या-क्षतैयुतम् ||

भगवान श्री कृष्ण के पूजा के दौरान इस मंत्र को पढ़ते हुए उन्हें आसन समर्पण करना चाहिए-

ॐ विचित्र रत्न-खचितं दिव्या-स्तरण-सन्युक्तम् |
स्वर्ण-सिन्हासन चारू गृहिश्व भगवन् कृष्ण पूजितः ||

सप्तदशाक्षर श्रीकृष्णमहामंत्र :

‘ऊ श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा’

यह श्रीकृष्ण का सप्तदशाक्षर महामंत्र है।

इस मंत्र का पांच या सवा लाख जाप करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है।

जप के समय हवन का दशांश अभिषेक का दशांश तर्पण तथा तर्पण का दशांश मार्जन करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है।

जिस व्यक्ति को यह मंत्र सिद्ध हो जाता है उसे सबकुछ प्राप्त हो जाता है।भगवान् विष्णु का

द्वादश अक्षर मन्त्र :

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

यह भगवान् विष्णु का महामन्त्र है।

इस मन्त्र को विष्णु भगवान के द्वादश अक्षर मन्त्र नाम से ख्याति प्राप्त है। इस मन्त्र की जप साधना के प्रभाव का वर्णन यहां संभव नहीं है। इस मन्त्र की सिद्धि प्राप्ति के पश्चात साधक के लिए कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता। इसका मन्त्र का जप करने के लिए कोई निषेध अथवा प्रतिबंधित नियम नहीं हैं।

स्त्री व पुरुष, ब्राह्मण अथवा शूद्र कोई भी, कभी भी, रास्ता चलते भी, इसका जप कर सकता है।

यह मन्त्र त्रिकाल में सत्य और फलदायी है।

मन्त्र निम्न प्रकार हैं :

♦ ॐ कृः।

♦ ॐ कृष्ण।

♦ ॐ क्लीं कृष्ण।

♦ ॐ गोपाल स्वाहा।

♦ ॐ क्लीं कृष्णाय।

♦ ॐ कृष्णाय नमः।

♦ ॐ क्लीं कृष्णाय क्लीं।

♦ ॐ कृष्णाय गोविन्दाय।

♦ ॐ क्लीं कृष्णाय नमः।

♦ ॐ बालवपुषे कृष्णाय स्वाहा।

♦ ॐ श्रीं ह्नीं क्लीं कृष्णाय।

♦ ॐ श्री कृष्णाय परब्रह्मणे नमः।

♦ ॐ दधिभक्षणाय स्वाहा।

♦ ॐ क्लीं ग्लौं श्यामलांगाय

♦ ॐ बाल वपुषे क्लीं कृष्णाय स्वाहा।

♦ ॐ ह्नीं ह्नीं श्रीं श्रीं लक्ष्मी वासुदेवाय नमः।

कृष्ण गायत्री मंत्र

कृष्ण गायत्री मन्त्र :

ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्।

उक्त वर्णित समस्त मन्त्र अभीष्ट फलदायक हैं। इन मन्त्रों को दैनिक पूजन में अथवा निश्चित संख्या में अथवा संकल्पबद्ध अनुष्ठान के रूप् मे जप कर अभीष्ट लाभ प्राप्त किया जा सकता है। आस्था प्रत्येक स्थिति में आवश्यक है।

कृष्ण कवच

कृष्ण ब्रह्माण्ड कवच

।। ब्रह्मोवाच ।।

राधाकान्त महाभाग ! कवचं यत् प्रकाशितं ।

ब्रह्माण्ड-पावनं नाम, कृपया कथय प्रभो ।। 1

मां महेशं च धर्मं च, भक्तं च भक्त-वत्सल ।

त्वत्-प्रसादेन पुत्रेभ्यो, दास्यामि भक्ति-संयुतः ।। 2

ब्रह्माजी बोले – हे महाभाग ! राधा-वल्लभ ! प्रभो ! ‘ब्रह्माण्ड-पावन’ नामक जो कवच आपने प्रकाशित किया है, उसका उपदेश कृपा-पूर्वक मुझको, महादेव जी को तथा धर्म को दीजिए । हे भक्त-वत्सल ! हम तीनों आपके भक्त हैं । आपकी कृपा से मैं अपने पुत्रों को भक्ति-पूर्वक इसका उपदेश दूँगा ।। 1-2

।। श्रीकृष्ण उवाच ।।

श्रृणु वक्ष्यामि ब्रह्मेश ! धर्मेदं कवचं परं ।

अहं दास्यामि युष्मभ्यं, गोपनीयं सुदुर्लभम् ।। 1

यस्मै कस्मै न दातव्यं, प्राण-तुल्यं ममैव हि ।

यत्-तेजो मम देहेऽस्ति, तत्-तेजः कवचेऽपि च ।। 2

श्रीकृष्ण ने कहा – हे ब्रह्मन् ! महेश्वर ! धर्म ! तुम लोग सुनो ! मैं इस उत्तम ‘कवच’ का वर्णन कर रहा हूँ । यह परम दुर्लभ और गोपनीय है । इसे जिस किसी को भी न देना, यह मेरे लिए प्राणों के समान है । जो तेज मेरे शरीर में है, वही इस कवच में भी है ।

कुरु सृष्टिमिमं धृत्वा, धाता त्रि-जगतां भव ।

संहर्त्ता भव हे शम्भो ! मम तुल्यो भवे भव ।। 3

हे धर्म ! त्वमिमं धृत्वा, भव साक्षी च कर्मणां ।

तपसां फल-दाता च, यूयं भक्त मद्-वरात् ।। 4

हे ब्रह्मन् ! तुम इस कवच को धारण करके सृष्टि करो और तीनों लिकों के विधाता के पद पर प्रतिष्ठित रहो । हे शम्भो ! तुम भी इस कवच को ग्रहण कर, संहार का कार्य सम्पन्न करो और संसार में मेरे समान शक्ति-शाली हो जाओ । हे धर्म ! तुम इस कवच को धारण कर कर्मों के साक्षी बने रहो । तुम सब लिग मेरे वर से तपस्या के फल-दाता हो जाओ ।

ब्रह्माण्ड-पावनस्यास्य, कवचस्य हरिः स्वयं ।

ऋषिश्छन्दश्च गायत्री, देवोऽहं जगदीश्वर ।। 5

धर्मार्थ-काम-मोक्षेषु, विनियोगः प्रकीर्तितः ।

त्रि-लक्ष-वार-पठनात्, सिद्धिदं कवचं विधे ।। 6

इस ‘ब्रह्माण्ड-पावन’ कवच के ऋषि स्वयं हरि हैं, छन्द गायत्री है, देवता मैं जगदीश्वर श्रीकृष्ण हूँ तथा इसका विनियोग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हेतु है । हे विधे ! ३ लाख बार ‘पाठ‘ करने पर यह ‘कवच’ सिद्ध हो जाता है ।

यो भवेत् सिद्ध-कवचो, मम तुल्यो भवेत्तु सः ।

तेजसा सिद्धि-योगेन, ज्ञानेन विक्रमेण च ।। 7

जो इस कवच को सिद्ध कर लेता है, वह तेज, सिद्धियों, योग, ज्ञान और बल-पराक्रम में मेरे समान हो जाता है।

।। मूल-कवच-पाठ ।।

सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़कर जल भूमि पर छोड़ दे।

विनियोगः-

ॐ अस्य श्रीब्रह्माण्ड-पावन-कवचस्य श्रीहरिः ऋषिः, गायत्री छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, धर्म-अर्थ-काम-मोक्षेषु विनियोगः ।

ऋष्यादि-न्यासः

श्रीहरिः ऋषये नमः शिरसि,

गायत्री छन्दसे नमः मुखे,

श्रीकृष्णो देवतायै नमः हृदि,

धर्म-अर्थ-काम-मोक्षेषु विनियोगाय नमः सर्वांगे ।

मूल कवच:

प्रणवो मे शिरः पातु, नमो रासेश्वराय च ।

भालं पायान् नेत्र-युग्मं, नमो राधेश्वराय च ।। 1

कृष्णः पायात् श्रोत्र-युग्मं, हे हरे घ्राणमेव च ।

जिह्विकां वह्निजाया तु, कृष्णायेति च सर्वतः ।। 2

श्रीकृष्णाय स्वाहेति च, कण्ठं पातु षडक्षरः ।

ह्रीं कृष्णाय नमो वक्त्रं, क्लीं पूर्वश्च भुज-द्वयम् ।। 3

नमो गोपांगनेशाय, स्कन्धावष्टाक्षरोऽवतु ।

दन्त-पंक्तिमोष्ठ-युग्मं, नमो गोपीश्वराय च ।। 4

ॐ नमो भगवते रास-मण्डलेशाय स्वाहा ।

स्वयं वक्षः-स्थलं पातु, मन्त्रोऽयं षोडशाक्षरः ।। 5

ऐं कृष्णाय स्वाहेति च, कर्ण-युग्मं सदाऽवतु ।

ॐ विष्णवे स्वाहेति च, कंकालं सर्वतोऽवतु ।। 6

ॐ हरये नमः इति, पृष्ठं पादं सदऽवतु ।

ॐ गोवर्द्धन-धारिणे, स्वाहा सर्व-शरीरकम् ।। 7

प्राच्यां मां पातु श्रीकृष्णः, आग्नेय्यां पातु माधवः ।

दक्षिणे पातु गोपीशो, नैऋत्यां नन्द-नन्दनः ।। 8

वारुण्यां पातु गोविन्दो, वायव्यां राधिकेश्वरः ।

उत्तरे पातु रासेशः, ऐशान्यामच्युतः स्वयम् ।

सन्ततं सर्वतः पातु, परो नारायणः स्वयं ।। 9।। फल-श्रुति ।।

इति ते कथितं ब्रह्मन् ! कवचं परमाद्भुतं ।

मम जीवन-तुल्यं च, युष्मभ्यं दत्तमेव च ।।

Krishna / Radha Arti

कृष्णजी की आरती

आरती कुंजबिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

गले में बैजन्तीमाला बजावैं मुरलि मधुर बाला॥

श्रवण में कुंडल झलकाता नंद के आनंद नन्दलाला की। आरती…।

गगन सम अंगकान्ति काली राधिका चमक रही आली।

लतन में ठाढ़े बनमाली भ्रमर-सी अलक कस्तूरी तिलक।

चंद्र-सी झलक ललित छबि श्यामा प्यारी की। आरती…।

कनकमय मोर मुकुट बिलसैं देवता दरसन को तरसैं।

गगन से सुमन राशि बरसैं बजै मुरचंग मधुर मृदंग।

ग्वालिनी संग-अतुल रति गोपकुमारी की। आरती…।

जहां से प्रगट भई गंगा कलुष कलिहारिणी गंगा।

स्मरण से होत मोहभंगा बसी शिव शीश जटा के बीच।

हरै अघ-कीच चरण छवि श्री बनवारी की। आरती…।

चमकती उज्ज्वल तट रेनू बज रही बृंदावन बेनू।

चहुं दिशि गोपी ग्वालधेनु हंसत मृदुमन्द चांदनी चंद।

कटत भवफन्द टेर सुनु दीन भिखारी की। आरती…।

कृष्ण राधा आरती


ॐ जय श्री राधा जय श्री कृष्ण, श्री राधा कृष्णाय नमः !!
घूम घुमारो घामर सोहे, जय श्री राधा, पट पीताम्बर मुनि मन मोहे जय श्री कृष्ण !!
जुगल प्रेम रस झम-झम झमकै, श्री राधा कृष्णाय नमः !! राधा राधा कृष्ण कन्हैया जय श्री राधा, भव भव सागर पार लगैया जय श्री कृष्ण !!

मंगल मूरित मोक्ष करैया, श्री राधा कृष्णाय नमः !!

Krishna Radha Tantra

Krishna Radha Mantra